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जिन्होंने रची भोजपुरी की दुनिया, दिखाया रास्ता (नवभारत टाइम्स) – जलज मिश्रा – दिल्ली चैप्टर, भाई,

भोजपुरी का रचना संसार अद्भुत रहा है। देसी बोली भाषा में दुनिया को नया नजरिया देने का काम किया है इसने। भोजपुरी के पास समृद्ध, गरिमामयी और श्रेष्ठ साहित्य की एक परम्परा रही है। ऐसा माना जाता है कि भाषा संस्कृति को अपने कंधों पर लेकर यात्रा करती है। भोजपुरी लोक की भाषा है। इस भाषा का संगीतात्मक स्वरघात (pitch accent) इसको वैदिक कालीन संस्कृति के अनुरूप खड़ा करता है। इसके कुछ जुड़ाव वैदिक कालीन संस्कृति से आने वाले महर्षि विश्वामित्र के शिष्य भोजगण से मिलते दिखाई पड़ते हैं तो कुछ विद्वान इसका संबंध सन 836 के समय भोजपुर बसाने वाले राजा मिहिर भोज से जोड़ते हैं।

देखा जाए तो भोजपुरी में लिखित साहित्य के साक्ष्य आठवीं सदी के आरम्भ से ही मिलने लगते हैं। भोजपुरी के इस दौर में साहित्य सोरठी, लोरकी, विजयमल, नयकवा, आल्हा जैसे गाथा गीतों के नाम है। गुरु गोरखनाथ के साबर मंत्रों में भोजपुरी है। चौरासी सिद्धों ने अपनी कविता में जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह भी भोजपुरी के आसपास दिखाई देती है। तुलसी और जायसी जैसे अवधी के कवियों ने भी भोजपुरी संज्ञा-शब्दों और कहीं-कहीं क्रिया-पदों का प्रयोग किया है। सूरदास के कुछ पदों में भी भोजपुरी दिखाई देती है।

कबीर मूल रूप से भोजपुरी के ही कवि हैं। कबीर के शिष्य धरमदास की शब्दावली भी भोजपुरी ही रही है। संत कवियों की परम्परा में धरनीदास आते हैं, उनके ‘प्रेम-प्रगास’ ग्रंथ की भाषा भोजपुरी है। चम्पारण के सरभंग संप्रदाय की कवियों की एक परम्परा रही है जिनपर पंडित गणेश चौबे ने काम किया, उनलोगों की भाषा भोजपुरी रही है। भोजपुरी भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन सबसे पहले जे बीम्स ने शुरू किया था। इस संबंध में इनका एक लेख ‘नोट्स ऑन द भोजपुरी डायलेक्ट्स ऑफ हिन्दी स्पोकेन इन वेस्टर्न बिहार’ उस समय रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में 1868 में छपा था। इसके बाद डॉ. ग्रियर्सन ने भोजपुरी लोकगीतों और भोजपुरी भाषा साहित्य पर काम किया। भोजपुरी के ग्राम गीतों की बात करें तो इसके सम्पादक के रूप में पं. कृष्णदेव उपाध्याय का नाम उल्लेखनीय है। घाघ की दोहे और कहावतें लोगों की जुबान पर आज भी राज करते हैं।

आधुनिक भोजपुरी कवियों में बिसराम का नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है। इन्होंने बहुत ही सरस और भावपूर्ण विरहा की रचना की है। भोजपुरी गजल की बात करे तो तेग अली का गजल संग्रह ‘बदमास दर्पण’ का नाम अव्वल आता है। उसके बाद इस विधा में अनेक ग्रंथ रचे गए। 1911 में बाबू रघुवीर नरायण ‘सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा से’ रचते हैं जिसे भोजपुरी का राष्ट्रीय गीत कहा जाता है और यह जन-जन में लोकप्रिय है। इसी दौर में महेंद्र मिश्र आते हैं जिन्हें अपने जीवन काल में ही पूरबी सम्राट कहा गया। ये भोजपुरी के प्रथम अप्रकाशित महाकाव्य ‘अपूर्व रामायण’ के प्रणेता थे। महेंद्र मिश्र उस दौर में देश भक्ति रचनाओं के साथ-साथ श्रम, स्त्री विमर्श और पलायन जैसे मुद्दों को गंभीरता से उठाते रहे। मनोरंजन प्रसाद की ‘फिरंगिया’ के साथ-साथ पंडित महेंद्र शास्त्री, चम्पारण से आने वाले श्यामविहारी तिवारी देहाती जैसे नाम अग्रणी रहे हैं। भोजपुरी नाटकों की बात करें तो इसमें महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने आठ नाटक लिखे, लेकिन उनके पहले से बिदेसिया का नाटक प्रचलन में था जिसे भिखारी ठाकुर ने आगे बढ़ाया था। भिखारी ठाकुर ने उस दौर के अनेक कुरीतियों को अपने नाटकों के माध्यम से दिखाया।

भोजपुरी गद्य का सबसे पुराना और अकाट्य प्रमाण वाला स्वरूप 12वीं सदी का लिखा हुआ व्याकरण ग्रन्थ ‘युक्ति व्यक्ति प्रकरण’ में मिलता है। भोजपुरी अपनी लिपि कैथी के साथ आज भी पुराने दस्तावेजों में दिखाई देती है। अनेक ऐसे हिन्दी के विद्वान हुए हैं जिन्होंने भोजपुरी में भी कार्य किया है। इनमें राहुल सांकृत्यायन, भाषा वैज्ञानिक सुनीति चटर्जी, आचार्य विद्यानिवास मिश्र, डॉ. विवेकी राय, केदारनाथ सिंह जैसे नाम अहम हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 1914 मे ‘सरस्वती’ पत्रिका मे हीरा डोम की भोजपुरी कविता ‘अछुत की शिकायत’ छापकर भोजपुरी भाषा अस्मिता आंदोलन को गति दी थी ।

आजादी के बाद भोजपुरी रचनात्मक आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले लोगों में मोती बी. ए., भोलानाथ गहमरी, पंडित धरीक्षण मिश्र, हवलदार त्रिपाठी, पांडेय कपिल, डॉ. स्वामी नाथ सिंह, राधा मोहन राधे, डॉ. अशोक द्विवेदी, जगन्नाथ, अनिरुद्ध प्रसाद, प्रो. नागेंद्र प्रसाद सिंह, गंगा प्रसाद ‘अरुण’, रघुवंश नरायण सिंह, रास बिहारी पाण्डेय, डॉ. राजेश्ववरी शाण्डिल्य, रसिक बिहारी ओझा ‘निर्भीक’, डॉ. प्रभुनाथ सिंह, डॉ. रिपुसुदन श्रीवास्तव, भगवती प्रसाद द्विवेदी, तैयब हुसैन, जौहर शाफियावादी, डाॅ. ब्रजभूषण मिश्र, डाॅ. जयकांत सिंह, प्रो. ब्रजकिशोर, पांडेय नर्मदेश्वर, अनिल ओझा ‘निरद’, अजीत दुबे जैसे कई नाम शामिल हैं।

आज भोजपुरी साहित्य में कविता, कहानी, आलोचना की बात हो या बाल साहित्य, यात्रा संस्मरण, निबंध लेखन, हर तरह का काम हो रहा है। देश-विदेश के हजारों लेखक, लेखिका और दर्जनों पत्र-पत्रिका आज भोजपुरी भाषायी अस्मिता को मुख्यधारा से जोड़ रहे है और राष्ट्रकवि दिनकर की उस बात को सार्थक करने में लगे हुए हैं, जिसमें वे कहते है कि संपर्क भाषा के तौर पर जितनी जरूरी हिन्दी है, उतनी ही जरूरी है मातृभाषा का प्रयोग।

– जलज कुमार अनुपम
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आपके विशेष मांग पे…संस्कृति निदेशालय उ. प्र. एवं भोजपुरी एसोसिएशन आफ इंडिया की एक अनुपम पारम्परिक प्रस्तुति धरोहर में ”द्वार पूजा” के समय की गाली…निर्देशक : राकेश श्रीवास्तव

राकेश श्रीवास्तव
क्षेत्रीय निदेशक – गोरखपुर चैप्टर
#भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (भाई)
मो- 9415282997, 9794844983, 05512240224
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सोने के सिन्होरवा लिहले अम्मा बाड़ी खाड़ हो…#भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (भाई) एवम संस्कृति निदेशालय, उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वाधान में पारंपरिक लोक गायन कार्यशाला के सातवें दिन मांग बोहराई के गीत का प्रशिक्षण देते हुए राकेश श्रीवास्तव, क्षेत्रीय निदेशक- भाई, राकेश उपाध्याय जी, सारिका श्रीवास्तव जी, सारिका राय जी, प्रमिला दुबे जी, शिवेंद्र पांडेय जी, नीरज सिंह जी, प्रेमनाथ जी एवम भाई परिवार एवम संस्कृति निदेशालय के अन्य सदस्य गण!!

अविनाश त्रिपाठी/भाई
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